सीहोर में नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध अर्पित किए जाने की घटना ने देशभर में बहस छेड़ दी है। एक तरफ इसे आस्था और श्रद्धा का प्रतीक बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे संसाधनों की बर्बादी और सामाजिक असंवेदनशीलता के रूप में देखा जा रहा है।
बताया जा रहा है कि प्रदेश में जहां लाखों बच्चे आज भी कुपोषण की समस्या से जूझ रहे हैं, वहां इतनी बड़ी मात्रा में दूध बहाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या इस दूध का उपयोग जरूरतमंदों के लिए नहीं किया जा सकता था।
इस मामले पर बाबा शिवानंद महाराज ने सफाई देते हुए कहा कि वे पिछले 21 दिनों से नर्मदा किनारे हवन कर रहे थे और प्रतिदिन 151 लीटर दूध से अभिषेक किया जा रहा था। उनके अनुसार, माता नर्मदा ने उन्हें सपने में आकर दूध अर्पित करने का आदेश दिया, जिसके चलते 11 हजार लीटर दूध से दुग्धाभिषेक किया गया।
वहीं, शिक्षा विशेषज्ञ अवि शुक्ला ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि दूध में मौजूद तत्व नदी के पानी की सतह पर परत बना सकते हैं, जिससे जलीय जीवों को ऑक्सीजन मिलने में दिक्कत हो सकती है। उनकी इस बात पर बाबा शिवानंद महाराज नाराज हो गए और चर्चा बीच में ही छोड़कर चले गए।
इस घटना के बाद आस्था और सामाजिक सरोकार के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो गई है, जिसने प्रशासन और आम जनता दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।










