Desk News : कभी-कभी आंकड़े इतने खूबसूरत होते हैं कि उन्हें देखकर व्यवस्था खुश हो जाती है, लेकिन वही आंकड़े जब खेत में किसान से पूछते हैं—“भाई, तुम्हें क्या मिला?”—तो किसान कुछ देर चुप रहता है और फिर कहता है, “साहब, हम तो आज भी अपनी फसल उसी व्यापारी को बेच रहे हैं।” यही चुप्पी आज किसान उत्पादक संगठन व्यवस्था की सबसे बड़ी कहानी है। देश में दस हजार किसान उत्पादक संगठनों का लक्ष्य पूरा हो चुका है। पैंसठ लाख से अधिक शेयरधारकों का उल्लेख है, हजारों संगठनों के पास बीज, उर्वरक और कीटनाशक लाइसेंस हैं, हजारों के पास प्रसंस्करण इकाइयां हैं और 31 जुलाई 2026 तक योजना के अंतर्गत गठित किसान उत्पादक संगठनों का संचयी कारोबार 20,358 करोड़ रुपये बताया गया है। कागज पर तस्वीर शानदार है, लेकिन खेत का किसान पूछ रहा है—मेरी फसल किसने खरीदी? मुझे कितना बेहतर मूल्य मिला? मेरी लागत कितनी कम हुई? मेरे किसान उत्पादक संगठन ने मेरे लिए किया क्या?
किसान उत्पादक संगठन वर्ष 2020 में पैदा नहीं हुआ
किसान उत्पादक संगठन की कहानी दस हजार किसान उत्पादक संगठनों की योजना से शुरू नहीं हुई। वर्ष 2011-12 के आसपास इसके लिए पहल शुरू हुई, वर्ष 2013 में प्रक्रिया और दिशा-निर्देश सामने आए, वर्ष 2014 को किसान उत्पादक संगठनों के वर्ष के रूप में आगे बढ़ाया गया और नाबार्ड के माध्यम से दो सौ करोड़ रुपये का उत्पादक संगठन विकास कोष बनाया गया। मार्च 2021 तक कंपनी अधिनियम के अंतर्गत नौ हजार पांच सौ से अधिक किसान उत्पादक संगठनों के पंजीकरण का उल्लेख भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के दस्तावेजों में मिलता है। यानी वर्ष 2020 की योजना शुरुआत नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर विस्तार का प्रयास थी। सवाल यह होना चाहिए था कि पहले से बने संगठनों से हमने क्या सीखा—कौन सफल हुआ, क्यों हुआ, कौन विफल हुआ और क्यों हुआ?
छह हजार आठ सौ पैंसठ करोड़ की योजना और बड़ा उद्देश्य
वर्ष 2020 में दस हजार किसान उत्पादक संगठनों की केंद्रीय क्षेत्र योजना शुरू हुई, जिसका कुल बजटीय परिव्यय 6,865 करोड़ रुपये था। उद्देश्य था किसानों की सामूहिक सौदेबाजी शक्ति बढ़ाना, सामूहिक खरीद से लागत घटाना, उत्पादन का एकत्रीकरण, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, ब्रांड, बाजार, ऋण और टिकाऊ व्यवसाय के माध्यम से किसान की आर्थिक शक्ति बढ़ाना। योजना में प्रति संगठन तीन वर्ष तक 18 लाख रुपये तक प्रबंधन सहायता, पात्र सदस्यों के आधार पर 15 लाख रुपये तक इक्विटी सहायता, पात्र परियोजना ऋण के लिए 2 करोड़ रुपये तक ऋण गारंटी और पांच वर्ष तक व्यावसायिक हाथ पकड़कर आगे बढ़ाने की व्यवस्था थी। अब सवाल संख्या का नहीं, परिणाम का है—इतनी सहायता के बाद कितने संगठन वास्तव में किसान का व्यवसाय बने?
शेयरधारक किसान और सक्रिय किसान में अंतर
पैंसठ लाख से अधिक शेयरधारक सुनने में बड़ी उपलब्धि है, लेकिन शेयरधारक होना और सक्रिय किसान होना अलग बात है। क्या किसान अपनी उपज संगठन को बेचता है? क्या संगठन से कृषि सामग्री खरीदता है? क्या संगठन उसकी लागत घटाता है? क्या बेहतर मूल्य दिलाता है? क्या संग्रह, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन करता है? क्या अपना ब्रांड बनाता है? क्या किसान को लाभ में हिस्सा मिलता है? यदि नहीं, तो शेयर रजिस्टर में नाम होना आर्थिक संगठन का प्रमाण नहीं है। किसान को कागज पर मालिक बनाना आसान है, व्यवसाय में मालिक बनाना कठिन।
हमारे क्षेत्रीय और नेटवर्क आधारित मैदानी अनुभव में एक चिंताजनक स्थिति दिखाई देती है। हमारे प्रारंभिक आकलन में कई क्षेत्रों में लगभग 80 प्रतिशत तक दर्ज शेयरधारक किसान अपने किसान उत्पादक संगठन की योजना, उद्देश्य और वास्तविक व्यवसायिक गतिविधियों से पर्याप्त रूप से परिचित नहीं दिखाई देते। यह राष्ट्रीय स्तर का प्रमाणित सर्वेक्षण नहीं, बल्कि हमारा मैदानी आकलन है। यदि यह गलत है तो स्वतंत्र जांच कराकर गलत सिद्ध किया जा सकता है। किसान से केवल पांच सवाल पूछिए—आपके संगठन का नाम क्या है, वह क्या करता है, आपने पिछले वर्ष कितना माल उसे बेचा, कितने रुपये मिले और आपको बाजार से कितना बेहतर मूल्य मिला? वास्तविक तस्वीर सामने आ जाएगी।
आधार सर्वेक्षण या केवल नामों की सूची?
आधार सर्वेक्षण का अर्थ केवल किसान का नाम, मोबाइल नंबर और भूमि विवरण लिखना नहीं हो सकता। वास्तविक सर्वेक्षण में यह पता होना चाहिए कि किसान क्या पैदा करता है, कितनी मात्रा में करता है, कहां और किस भाव पर बेचता है, उसकी लागत क्या है, कौन सा उत्पाद एकत्रित और प्रसंस्कृत हो सकता है, बाजार कौन है, खरीदार कौन है, कितनी कार्यशील पूंजी चाहिए और संभावित लाभ कितना है। सूची से संस्था बन सकती है, व्यवसाय नहीं।
अब बात सीबीबीओ की
क्लस्टर आधारित व्यावसायिक संगठन की भूमिका केवल किसान उत्पादक संगठन का गठन करना नहीं थी। क्लस्टर पहचान, आधार सर्वेक्षण, किसान लामबंदी, मूल्य शृंखला अध्ययन, समूह निर्माण, संगठन गठन, निदेशक मंडल की भूमिका एवं जिम्मेदारी का प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण, व्यवसाय योजना, उसका क्रियान्वयन, बाजार संपर्क, प्रसंस्करण और दीर्घकालिक स्थायित्व के लिए हाथ पकड़कर आगे बढ़ाना—ये सभी जिम्मेदारियां व्यवस्था में निर्धारित थीं। इसलिए सवाल सीधा है—यदि पांच वर्ष की व्यावसायिक सहायता के बाद भी किसान उत्पादक संगठन व्यवसाय नहीं सीख पाया तो उस सहायता का मूल्यांकन कैसे होगा?
किसान उत्पादक संगठन के सफल होने का प्रमाण यह नहीं कि प्रशिक्षण हुआ, उपस्थिति लगी, फोटो खिंची और प्रमाणपत्र मिला। प्रशिक्षण का परिणाम होना चाहिए—ज्ञान से कौशल, कौशल से कार्यान्वयन, कार्यान्वयन से व्यवसाय, व्यवसाय से आय, आय से लाभ और लाभ से किसान लाभ। यदि श्रृंखला प्रशिक्षण और प्रमाणपत्र पर खत्म हो गई तो किसान की समस्या वहीं की वहीं है।
दस निदेशक, दस हस्ताक्षर या दस व्यवसायिक जिम्मेदारियां?
कई किसान उत्पादक संगठनों में दस निदेशक हैं, लेकिन उनकी वास्तविक जिम्मेदारियां स्पष्ट नहीं। बैठक में आना, कागज पर हस्ताक्षर करना और संकल्प पारित करना पर्याप्त नहीं। दस निदेशक हैं तो दस व्यवसायिक जिम्मेदारियां क्यों नहीं—किसान संपर्क, खरीद, कृषि सामग्री, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और ब्रांड, विपणन, वित्त, संस्थागत बाजार, डिजिटल व्यापार और विस्तार। दस निदेशक का अर्थ दस हस्ताक्षर नहीं, दस जिम्मेदारियां होना चाहिए।
मुख्य कार्यकारी अधिकारी की भूमिका भी केवल कर विवरणी, बिल, लेखा और बैठक तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसकी मेज पर हर महीने सक्रिय किसान, खरीद, किसान भुगतान, बिक्री, भंडार, बकाया, सकल लाभ, शुद्ध लाभ, खरीदार और अगले महीने की बिक्री का आंकड़ा होना चाहिए। यदि यह नहीं है तो सवाल उठना स्वाभाविक है—हम किसान उत्पादक संगठन चला रहे हैं या अनुपालन केंद्र?
खाद-बीज की दुकान मंजिल नहीं
बीज, खाद और कीटनाशक का कारोबार गलत नहीं है। समस्या तब है जब पूरा किसान उत्पादक संगठन उसी में सीमित हो जाए। किसान संगठन से कृषि सामग्री खरीदे, फसल पैदा करे और फिर वही फसल किसी व्यापारी को बेच दे—तो संगठन बीच में केवल एक और कड़ी बनकर रह जाता है। किसान उत्पादक संगठन का वास्तविक मॉडल होना चाहिए—किसान → संग्रह → प्रसंस्करण → मूल्य संवर्धन → पैकेजिंग → अपना ब्रांड → बाजार → उपभोक्ता → राजस्व → लाभ → किसान लाभ।
किसान उत्पादक संगठन को व्यापारी का विकल्प मात्र नहीं, बाजार का खिलाड़ी बनना होगा। अकेला किसान कमजोर है; हजार किसान सामूहिक मात्रा हैं। सामूहिक मात्रा खरीदार को आकर्षित करती है, गुणवत्ता बेहतर मूल्य दिलाती है, प्रसंस्करण मूल्य बढ़ाता है और ब्रांड किसान को बाजार में पहचान देता है।
20,358 करोड़ रुपये का कारोबार—लेकिन कारोबार की गुणवत्ता?
31 जुलाई 2026 तक 20,358 करोड़ रुपये संचयी कारोबार का आंकड़ा निश्चित रूप से बड़ा है, लेकिन कारोबार और किसान लाभ एक ही चीज नहीं हैं। कारोबार को कम से कम चार हिस्सों में देखना चाहिए—कृषि सामग्री बिक्री, सामान्य कृषि उपज व्यापार, मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण, तथा सीधे बाजार और उपभोक्ता को बिक्री। एक करोड़ रुपये का कारोबार करने वाले दो संगठनों में एक केवल कृषि सामग्री बेचता हो और दूसरा किसानों की उपज खरीदकर उसे प्रसंस्कृत कर अपने ब्रांड से बेचता हो, तो दोनों को समान सफलता नहीं कहा जा सकता। कारोबार संस्था का आकार बताता है, लाभ व्यवसाय की ताकत और किसान को मिला आर्थिक लाभ संस्था की वास्तविक सफलता।
सरकारी जानकारी के अनुसार वर्ष 2024-25 के लेखापरीक्षित विवरणों में लगभग 6,964 संगठनों का कारोबार 50 लाख रुपये तक, 862 का 50 लाख से 1 करोड़ रुपये और 1,135 का 1 करोड़ रुपये से अधिक बताया गया। छोटा कारोबार अपने आप में असफलता नहीं है, लेकिन अब सवाल होना चाहिए—कितने संगठन बढ़ रहे हैं, कितने स्थिर हैं, कितने निष्क्रिय हैं और कितनों में किसान वास्तविक व्यापार कर रहा है?
स्वयं स्थापित और योजना से बने संगठनों का अंतर
हमारे क्षेत्रीय और नेटवर्क आधारित मैदानी आकलन में स्वयं की पहल, स्थानीय आवश्यकता और व्यवसायिक उद्देश्य से बने किसान उत्पादक संगठनों में लगभग 70 प्रतिशत तक संगठन सक्रिय और व्यवसायिक दिखाई देते हैं, जबकि सरकारी योजना के अंतर्गत गठित संगठनों में यह स्तर हमारे आकलन में अधिकतम लगभग 10 प्रतिशत तक दिखाई देता है। यह राष्ट्रीय स्तर का प्रमाणित आंकड़ा नहीं है; यह हमारा मैदानी आकलन है। लेकिन यदि अंतर वास्तव में है तो प्रश्न केवल किसान उत्पादक संगठनों का नहीं, बल्कि योजना के क्रियान्वयन मॉडल का है। स्वयं की जरूरत से बना संगठन क्यों टिकता है और बाहरी सहायता से बना संगठन सहायता समाप्त होते ही कमजोर क्यों पड़ता है?
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सभी योजना आधारित किसान उत्पादक संगठन असफल नहीं हैं। देश में अनेक संगठन अच्छा काम कर रहे हैं। उन्होंने संग्रह, प्रसंस्करण, ब्रांड, बाजार और किसान लाभ का रास्ता बनाया है। इसलिए असली सवाल यह है—जो सफल हुए, उनकी सफलता बाकी संगठनों तक क्यों नहीं पहुंची?
कम सक्रिय संगठनों पर अब वास्तविक कार्रवाई चाहिए
सरकारी व्यवस्था में कम सक्रिय किसान उत्पादक संगठनों को अतिरिक्त क्षमता निर्माण, व्यवसाय सुविधा और बाजार संपर्क के माध्यम से सुधारने की बात कही गई है। स्वागत योग्य है। लेकिन अब पूछा जाना चाहिए—कम सक्रिय संगठन कितने हैं? कब चिन्हित हुए? कितनों को सुधार योजना मिली? कितनों की स्थिति सुधरी? कितने आज भी निष्क्रिय हैं? कितनों का पुनर्गठन या विलय हुआ? और जिन्हें सुधारने की जिम्मेदारी दी गई, उनके प्रदर्शन का मूल्यांकन किस आधार पर हुआ?
किसान उत्पादक संगठन की वास्तविक जांच कैसी हो?
हर संगठन का स्वतंत्र धरातलीय परीक्षण होना चाहिए—गठन का आधार, कुल और सक्रिय शेयरधारक, गांवों की वास्तविक भागीदारी, किसान से खरीद, खरीद की मात्रा, किसान भुगतान, बेहतर मूल्य, कृषि सामग्री कारोबार, लागत बचत, संग्रह, प्रसंस्करण, अपना ब्रांड, बाजार, उपभोक्ता बिक्री, राजस्व की गुणवत्ता, शुद्ध लाभ, किसान लाभ, निदेशकों की भूमिका और सरकारी सहायता के बिना टिकाऊपन। प्रमाण के लिए शेयर रजिस्टर, किसानवार लेन-देन, खरीद रजिस्टर, तौल पर्चियां, बैंक भुगतान, बाजार तुलना, बिक्री रजिस्टर, कर चालान, भंडार, उत्पादन, ब्रांड, खरीदार समझौते, बिक्री चालान और लेखापरीक्षित वित्तीय विवरण देखे जाएं।
हर किसान उत्पादक संगठन की वार्षिक रिपोर्ट में एक “किसान प्रभाव विवरण” अनिवार्य होना चाहिए—कितने सक्रिय किसान, कितनी खरीद, किसानों को कुल भुगतान, बाजार की तुलना में मूल्य लाभ, लागत बचत, मूल्य संवर्धन, शुद्ध लाभ और किसानों को मिला प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ।
और एक कठोर परीक्षा भी होनी चाहिए—यदि किसान उत्पादक संगठन बारह महीने बंद हो जाए तो सक्रिय किसानों को कितना आर्थिक नुकसान होगा? यदि उत्तर है “विशेष फर्क नहीं पड़ेगा”, तो संगठन अभी किसान के आर्थिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा रहा।
पुरस्कार भी बदलने होंगे
सबसे अधिक प्रशिक्षण, लाइसेंस, प्रदर्शनी, बैठक या फोटो वाला संगठन सफल नहीं माना जाना चाहिए। पुरस्कार उस संगठन को मिले जिसने किसान से वास्तविक खरीद की, बेहतर मूल्य दिलाया, लागत कम की, प्रसंस्करण किया, मूल्य संवर्धन किया, अपना ब्रांड बनाया, नियमित बाजार बनाया, शुद्ध लाभ कमाया और किसान को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ दिया।
सरकार से 25 सीधे सवाल
दस हजार संगठन बन गए—वास्तव में सक्रिय कितने हैं? लाभ में कितने हैं? लगातार घाटे में कितने हैं? निष्क्रिय कितने हैं? पिछले बारह महीनों में कितने किसानों ने अपनी उपज संगठन को बेची? कितने शेयरधारक केवल कागज पर हैं? कितने किसान संगठन से कृषि सामग्री खरीदते हैं? किसानों की लागत कितनी कम हुई? किसानों को बाजार से कितना बेहतर मूल्य मिला? कितनों ने वास्तविक प्रसंस्करण शुरू किया? कितनों का अपना ब्रांड है? कितने नियमित बाजार में बेच रहे हैं? कितने सीधे उपभोक्ता से जुड़े हैं? कितने संस्थागत खरीदारों से जुड़े हैं? कितने सरकारी सहायता के बिना चल सकते हैं? पांच वर्ष की व्यावसायिक सहायता का वास्तविक परिणाम क्या है? कम सक्रिय संगठन कब चिन्हित हुए? कितनों को सुधार योजना मिली? कितनों की स्थिति सुधरी? कितने अब भी निष्क्रिय हैं? सीबीबीओ का प्रदर्शन किस आधार पर मापा गया? क्या सीबीबीओ का भुगतान वास्तविक परिणामों से जुड़ा? क्या किसान से स्वतंत्र रूप से पूछा गया कि उसे कितना लाभ मिला? क्या किसान प्रभाव विवरण सार्वजनिक होगा? और क्या अब नई संख्या बढ़ाने से पहले पुराने संगठनों को मजबूत किया जाएगा?
अब चाहिए—किसान उत्पादक संगठन सुधार अभियान
दस हजार की संख्या पूरी हो चुकी है। अब अगला लक्ष्य केवल ग्यारह हजार, बारह हजार या बीस हजार संगठन बनाना नहीं होना चाहिए। अब जरूरत है—किसान उत्पादक संगठन सुधार अभियान की। जो अच्छा है उसका विस्तार, जो कमजोर है उसका सुधार, जो निष्क्रिय है उसका पुनर्गठन, जहां आवश्यक हो वहां विलय, कमजोर नेतृत्व में जिम्मेदारी तय करना, कमजोर प्रबंधन में सुधार, बाजारविहीन संगठन को बाजार देना, उत्पादविहीन संगठन को उत्पाद आधारित व्यवसाय देना और किसान से वास्तविक आर्थिक जुड़ाव बनाना।
अब सूत्र होना चाहिए—गठन से सुधार, संख्या से गुणवत्ता, अनुदान से व्यवसाय और शेयरधारक से सक्रिय किसान तक।
तेजस्वी संगठन न्यास का स्पष्ट मत
हम सरकार के विरोधी नहीं, किसान के पक्षधर हैं। हम योजना के विरोधी नहीं, परिणाम की मांग कर रहे हैं। हम किसान उत्पादक संगठन के विरोधी नहीं, कमजोर कार्यशैली के विरोधी हैं। हम सीबीबीओ के विरोधी नहीं, परिणामहीन कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं। सरकार संसाधन दे सकती है, नीति बना सकती है और सहायता कर सकती है; लेकिन रोज का बाजार, खरीद, बिक्री, ग्राहक और लाभ किसान उत्पादक संगठन को ही पैदा करना होगा।
अनुदान से संस्था शुरू हो सकती है, व्यवसाय से संस्था चलती है।
अब किसान उत्पादक संगठन की सफलता का पैमाना बदलना होगा। गठन उपलब्धि नहीं, संचालन उपलब्धि है। संचालन उपलब्धि नहीं, व्यवसाय उपलब्धि है। व्यवसाय उपलब्धि नहीं, लाभ उपलब्धि है। और लाभ भी अंतिम उपलब्धि नहीं—किसान को मिला वास्तविक आर्थिक लाभ अंतिम उपलब्धि है।
दस हजार किसान उत्पादक संगठन बन गए। छह हजार आठ सौ पैंसठ करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान है। अठारह लाख रुपये तक प्रबंधन सहायता, पंद्रह लाख रुपये तक इक्विटी सहायता, दो करोड़ रुपये तक ऋण गारंटी, पांच वर्ष तक व्यावसायिक हाथ पकड़ने की व्यवस्था, पैंसठ लाख से अधिक शेयरधारक और 20,358 करोड़ रुपये से अधिक संचयी कारोबार—इन सबके बाद किसान का एक सवाल पूछना गलत नहीं है—
“मुझे मिला क्या?”
यदि जवाब है—बेहतर मूल्य मिला, लागत कम हुई, प्रसंस्करण हुआ, अपना ब्रांड बाजार में बिका, लाभ में हिस्सा मिला—तो व्यवस्था सफल है।
लेकिन यदि किसान आज भी उसी लागत पर खेती कर रहा है, उसी व्यापारी को उसी तरह फसल बेच रहा है और किसान उत्पादक संगठन उसके आर्थिक जीवन में कोई खास बदलाव नहीं ला पाया, तो आंकड़ों की चमक से बाहर निकलकर खेत की मिट्टी में उतरना होगा।
अब समय है—
कागज से खेत तक।
शेयरधारक से सक्रिय किसान तक।
प्रशिक्षण से कार्यान्वयन तक।
अनुदान से व्यवसाय तक।
व्यापारी पर निर्भरता से अपने बाजार तक।
उत्पादक से उद्यमी तक।
और अंततः—
“किसान के नाम पर संस्था नहीं, किसान के हाथ में आर्थिक शक्ति चाहिए।”
क्योंकि किसान उत्पादक संगठन की सफलता किसी सरकारी फाइल में नहीं, किसान के खेत, किसान के कारोबार, किसान के बैंक खाते, किसान के उत्पाद के बाजार और किसान के आत्मविश्वास में दिखाई देनी चाहिए।
और यदि यह दिखाई नहीं दे रहा है तो सवाल पूछना ही पड़ेगा—
“हमने बातें तो बहुत कीं… आखिर किया क्या?”










