रायपुर, खनन के बाद प्रभावित वन भूमि को उसकी प्राकृतिक पहचान लौटाने के लिए अब केवल पौधरोपण नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और दीर्घकालिक पुनरुद्धार पर जोर दिया जाएगा। वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप ने शुक्रवार को कोरबा प्रवास के दौरान एनटीपीसी के प्रशासनिक भवन में सार्वजनिक एवं निजी उपक्रमों के प्रतिनिधियों तथा वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की समीक्षा बैठक लेकर इस संबंध में सख्त निर्देश दिए।
बैठक में खनन और औद्योगिक परियोजनाओं से प्रभावित वन भूमि के रेस्टोरेशन और रिक्लेमेशन की विस्तार से समीक्षा की गई। मंत्री ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। विकास के लिए संसाधनों का उपयोग जरूरी है, लेकिन इससे होने वाली पर्यावरणीय क्षति की भरपाई करना और वन भूमि को दोबारा स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र में बदलना भी उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
स्थानीय और देशज प्रजातियों को मिलेगी प्राथमिकता
मंत्री ने संबंधित कंपनियों को निर्देश दिए कि खनन प्रभावित क्षेत्रों में केवल तेजी से बढ़ने वाले पौधों का एकरूप रोपण न किया जाए। स्थानीय और देशज प्रजातियों को प्राथमिकता देते हुए पौधों का चयन क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी, जल उपलब्धता और प्राकृतिक वन संरचना के अनुसार किया जाए। इसका उद्देश्य ऐसे टिकाऊ वन तैयार करना है, जो लंबे समय तक विकसित हों और प्राकृतिक पुनरुत्पादन को भी बढ़ावा दें।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख अरुण कुमार पांडे ने कहा कि वैज्ञानिक पुनरुद्धार केवल ओवरबर्डन डंप तक सीमित नहीं होना चाहिए। खनन से प्रभावित पूरे क्षेत्र में भूमि सुधार, मृदा संरक्षण और पौधरोपण का कार्य वैज्ञानिक तकनीकों के अनुसार किया जाए। उन्होंने भू-क्षरण रोकने और भूमि को दोबारा वन विकास के योग्य बनाने के लिए स्थल-विशिष्ट तकनीकों के उपयोग पर जोर दिया।
वन्यजीवों के आवास और आवागमन पर भी ध्यान
बैठक में वन्यजीव संरक्षण को भी पुनरुद्धार योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने के निर्देश दिए गए। खनन प्रभावित क्षेत्रों में वन्यजीवों के आवास, सुरक्षित आवागमन और प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां विकसित करने पर जोर दिया गया। अधिकारियों से कहा गया कि पुनरुद्धार की योजनाएं स्थानीय जैव विविधता और वन्यजीवों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की जाएं।
सीएसआर से स्थानीय लोगों को मिले लाभ
वन मंत्री ने औद्योगिक और खनन कंपनियों को अपने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड का प्रभावी उपयोग करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि खनन प्रभावित क्षेत्रों के ग्रामीणों और स्थानीय समुदायों के आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक विकास से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता दी जाए, ताकि विकास का सीधा लाभ प्रभावित लोगों तक पहुंचे और उनके जीवन स्तर में सकारात्मक बदलाव आए।
मैदानी स्तर पर होगी नियमित निगरानी
वन विभाग के मैदानी अमले को पुनरुद्धार कार्यों की निगरानी के लिए जवाबदेह बनाया गया है। संबंधित वन मंडलाधिकारी और अधिकारी नियमित रूप से क्षेत्र का निरीक्षण करेंगे तथा कार्यों की वास्तविक स्थिति की जानकारी विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज करेंगे। पौधों की उत्तरजीविता, भूमि की स्थिति, कार्यों की गुणवत्ता और वैज्ञानिक मानकों के पालन की नियमित समीक्षा भी की जाएगी।
बैठक में स्पष्ट किया गया कि खनन के बाद वन भूमि की बहाली केवल कागजी प्रक्रिया या औपचारिक अनुपालन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसका परिणाम धरातल पर दिखाई देना चाहिए। स्थानीय प्रजातियों की स्थापना, मृदा संरक्षण, जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण के साथ स्थानीय समुदायों के हितों को ध्यान में रखते हुए खनन प्रभावित क्षेत्रों को दोबारा स्वस्थ और टिकाऊ पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित करने पर विशेष जोर दिया गया।
बैठक में विधायक कटघोरा प्रेमचंद पटेल, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (लैंड मैनेजमेंट) सुनील मिश्रा सहित पावर ग्रिड कॉरपोरेशन, हिंडालको, एसईसीएल, एनटीपीसी, बालको, अडानी समूह और अन्य सार्वजनिक एवं निजी औद्योगिक एवं खनन उपक्रमों के वरिष्ठ अधिकारी तथा वन विभाग के अधिकारी मौजूद रहे।







