वो भारतीय लड़की, जिसके लिए क्वीन विक्टोरिया ने पलटा था ब्रिटिश जज का फैसला

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Birthday Special : 156 साल पहले 22 नवंबर को एक सामान्य मराठी परिवार में जन्मी रुक्माबाई राउत (Rukhmabai Raut) का नाम कई वजहों से दोहराए जाने लायक है. महान भारतीय महिलाओं की लिस्ट में राउत के एक कानूनी केस (Pioneer Legal Case) और एक डिग्री की खासी अहमियत है.

भारतीय समाज कई रूढ़ियों और कुप्रथाओं से ग्रस्त रहा और समय के साथ मुक्त हुआ. उदाहरण के लिए राजा राममोहन राय (Raja Ram Mohan Roy) ने कैसे सती प्रथा का खात्मा करने की पहल की, यह इतिहास बताता है, लेकिन एक महिला ने कैसे बाल विवाह (Child Marriage) की कुरीति को खत्म करने के लिए गुलाम भारत में पहली बार कानूनी लड़ाई (Historic Court Case) लड़ी, यह आप तक किताबें ठीक से नहीं पहुंचा पातीं. रुक्माबाई (या रखमाबाई) राउत का नाम तब चर्चा में आया था, जब गूगल ने उनकी याद में डूडल बनाया था. लेकिन यह कहानी एक डूडल से बहुत ज़्यादा बड़ी और अहम है.

कल्पना कीजिए कि कांग्रेस की स्थापना होने में वक्त है और उस समय यानी 1884-85 में एक केस लड़ा जा रहा है, जिसमें एक युवती अपने पति के साथ रहने से इनकार कर रही है क्योंकि उसकी शादी उसकी मर्ज़ी के बगैर सिर्फ 11 साल की उम्र में कर दी गई थी. इस केस की इतनी चर्चा है कि एक तरफ, बालगंगाधर तिलक अखबार में इस पर कॉलम लिख रहे थे तो दूसरी तरफ इंग्लैंड के मीडिया में रुडयार्ड किपलिंग. आइए इस केस और बहुत खास रुक्माबाई से रूबरू होते हैं.

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क्या था बाल विवाह से जुड़ा यह केस?
जब दादाजी भीकाजी की उम्र 19 साल की थी, तब 22 नवंबर 1864 को जन्मीं रुक्मा की शादी 11 साल की उम्र में कर दी गई. हालांकि, रुक्मा अपने मायके में ही रहती रहीं. सौतेले पिता और असिस्टेंट सर्जन सखाराम अर्जुन राउत ने रुक्मा का तब साथ दिया था, जब उन्होंने भीकाजी के साथ रहने से मना कर दिया था. रुक्मा की इस ज़िद के चलते मुकदमा शुरू हुआ ‘दादाजी भीकाजी बनाम रुक्माबाई केस, 1885’.

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गूगल ने 2017 में रुक्माबाई के सम्मान में डूडल बनाया था.

भीकाजी ने दाम्पत्य जीवन के बहाल होने के अधिकार के लिए दावा किया, तो जज रॉबर्ट हिल ने साफ कहा कि रुक्मा की शादी बहुत कम उम्र में उसकी मर्ज़ी के बगैर हुई इसलिए उसे मजबूर नहीं किया जा सकता. इस तरह के जजमेंट से हिंदू समाज में आलोचना का दौर शुरू हुआ और इसे हिंदू परंपराओं पर हमला माना गया. हिंदू बनाम अंग्रेज़ी कानून के मुद्दे पर भारत और इंग्लैंड में बहस शुरू हो गई.

अदालत ने बदला फैसला, लेकिन रुक्मा ने मन नहीं
यह बहस इतनी गर्म हुई कि अदालत के फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन बढ़ गए. आखिरकार अदालत को मजबूर होकर परंपराओं को मद्दे नज़र रखते हुए फैसला पलटना पड़ा. 4 मार्च 1887 को फैसला दिया गया कि या तो रुक्माबाई अपने पति के साथ रहने जाएं या फिर छह महीने के लिए जेल की सज़ा भुगतें. और रुक्माबाई मुकदमा हारकर भी तब जीतीं, जब उन्होंने अपने अधिकार के लिए जेल जाना मंज़ूर किया.

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रानी का दखल और केस का असर
रुक्माबाई के इरादों को देखते हुए दोनों देशों में महिला अधिकारों और खासकर ‘मर्ज़ी की उम्र’ को लेकर वाद विवाद और चलता रहा. इस केस में रुक्मा का स्टैंड इतना प्रगतिशील था कि इंग्लैंंड की रानी रहीं और भारत की शासक क्वीन विक्टोरिया को दखल देना पड़ा. विक्टोरिया ने अदालत के फैसले को खारिज करते हुए रुक्मा के पक्ष में उनकी शादी को भंग करवाया और दो हज़ार रुपये के भुगतान के बाद भीकाजी ने भी अपना दावा छोड़ दिया.

इसके बाद भी, इस केस की हवा बनी रही और आखिरकार में 1891 में कानून में बदलाव हुआ. शादी के लिए लड़की की वैध उम्र या मर्ज़ी की उम्र को 10 साल से बढ़ाकर 12 साल किया गया. ‘एज ऑफ कन्सेंट एक्ट 1891’ में हालांकि यह महिला अधिकारों के लिहाज़ से मामूली बदलाव था, लेकिन लंबी लड़ाई की शुरूआत हो चुकी थी और यह बहुत बड़ी जीत थी.

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रुक्माबाई राउत की यह तस्वीर विकिपीडिया से साभार.

तो पहली महिला डॉक्टर होतीं रुक्मा!
इस केस से मुक्त होने के बाद रुक्माबाई अपनी पढ़ाई पर फोकस कर सकीं. उसके बाद इंग्लैंड जाकर उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई की. साल 1894 में रुक्माबाई ने लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन फॉर वीमन से डॉक्टर ऑफ मेडिसिन यानी एमडी की डिग्री हासिल की. क्या आपको पता है कि भारत की पहली महिला डॉक्टर कौन थीं? आपने आनंदी गोपाल जोशी का नाम सुना है, जिन्होनें मार्च 1886 में डॉक्टर की डिग्री हासिल की थी.

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जी हां, जोशी पहली डॉक्टर थीं, लेकिन कम उम्र में ही गुज़र जाने के कारण वो मेडिकल प्रैक्टिस करने वाली डॉक्टर नहीं बन सकी थीं. कादंबिनी गांगुली भी 1886 में ही डाक्टर बनी थीं और इसके बाद सालों तक बतौर फिज़िशियन प्रैक्टिस करने वाली पहली डॉक्टर बनी थीं. दूसरी डॉक्टर रुक्मा थीं, जिन्होंने सालों तक बतौर डॉक्टर सेवाएं दीं. अगर बाल विवाह संबंधी केस का किस्सा न हुआ होता तो रुक्मा देश की संभवत: पहली म​हिला डॉक्टर हो सकती थीं.

रुक्माबाई : एक फेमिनिस्ट
अपने केस और स्टैंड के चलते बतौर फेमिनिस्ट स्थापित हो गईं रुक्माबाई की चर्चा इंग्लैंड की पत्रिकाओं और किताबों तक में होती रही. अपने करियर और आगामी जीवन में भी उन्होंने महिलाओं के पक्ष में काम करने के अपने जज़्बे को बरकरार रखा. उदाहरण के लिए उन्हें मेडिकल क्षेत्र में काफी बड़े पदों की पेशकश भी की गई लेकिन वो राजकोट और सूरत के ज़नाना यानी महिला अस्पतालों में ही सेवाएं देती रहीं.

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