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Chandigarh National Uttar Pradesh

जींद में सबसे ज्यादा जाट मतदाता हैं लेकिन 1972 के बाद इस समुदाय का कोई व्यक्ति यहां से विधानसभा नहीं पहुंचा. दूसरी ओर यहां कभी बीजेपी भी खाता नहीं खोल पाई है.

हरियाणा के ‘जाटलैंड’ जींद में होने जा रहे उप चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए जीत बड़ी चुनौती है. दोनों पार्टियों में से कोई भी जीतेगा तो परंपरा टूटेगी और नया रिकॉर्ड बनेगा. सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए यह चुनाव नाक का सवाल बन गया है तो कांग्रेस की ओर से रणदीप सुरजेवाला के मैदान में उतरने से मामला दिलचस्प हो गया है. हाल ही में बनी दुष्यंत चौटाला की जन नायक जनता पार्टी (जेजेपी) और बीजेपी के बागी राजकुमार सैनी के लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी का भविष्य भी इस चुनाव के नतीजों पर टिका है. इसके परिणाम के आधार पर हरियाणा में लोकसभा चुनाव  का माहौल भी बनेगा.

दिलचस्प बात यह है कि इस विधानसभा सीट को जाट बनाम नॉन जाट वाली पॉलिटिक्स की प्रयोगशाला बना दिया गया है. जाट बहुल इस सीट पर 1972 के बाद कोई जाट विधायक नहीं बना है, न तो कभी भाजपा का ही खाता खुला. देखना यह है कि इनेलो, कांग्रेस और जननायक जनता पार्टी जाट प्रत्याशी को जिता कर रिकॉर्ड बनाते हैं या फिर बीजेपी पहली बार जाटलैंड की इस सीट पर अपना खाता खोलकर इतिहास रचेगी? (इसे भी पढ़ें: इस प्रदेश में 2014 से कांग्रेस की जिला कमेटियां हैं भंग, पार्टी कैसे जीतेगी 2019 की जंग?)

सत्तारूढ़ भाजपा ने इस सीट पर जहां पंजाबी (गैर जाट) कार्ड खेला है, तो वहीं कांग्रेस, जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) और इनेलो ने जाट प्रत्याशी पर दांव लगाया है. बीजेपी ने यहां इनेलो के विधायक रहे डॉ. हरीचंद मिड्ढा के बेटे कृष्ण मिड्ढा को टिकट दिया है. हरी मिड्ढा की मौत के बाद यह सीट खाली हुई थी. इसके बाद उनके बेटे बीजेपी में शामिल हो गए थे. वह यहां पर दो बार से विधायक थे. वह पंजाबी समुदाय से आते हैं.



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वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने यहां अपने राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला को प्रत्याशी बनाया है, जो राहुल गांधी के खासमखास माने जाते हैं. वह इस वक्त कैथल से विधायक हैं. उधर हाल ही में इनेलो से टूटकर बनी जननायक जनता पार्टी ने दिग्विजय चौटाला को मैदान में उतारा है. वहीं इनेलो ने उम्मेद सिंह रेढू को टिकट दिया है. नामांकन वापसी की प्रक्रिया के बाद अब कुल 21 उम्मीदवार मुकाबले में बचे हैं

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तीन-तीन जाट उम्मीदवार सत्तारूढ़ भाजपा के लिए राहत देने वाले हो सकते हैं, क्योंकि जाट वोट बंट जाएंगे. मगर सियासी विश्लेषकों का कहना है कि इसके बाद भी भाजपा की राह उतनी आसान नहीं होगी जितना दावा किया जा रहा है. क्योंकि 2014 में मनोहरलाल खट्टर को सीएम बनाने के बाद बीजेपी की छवि गैर जाट पॉलिटिक्स करने वाली पार्टी की बन गई है.

लोकनीति-सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्‍टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटी) के एक सर्वे में जाट बीजेपी से नाराज बताए गए हैं. ऐसे में जाट बहुल सीट पर जाटों का वोट लेकर कमल खिलाने की सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला की है. ये चुनौती तब और बढ़ जाती है जब पार्टी के बड़े नेता दबी जुबान से गैरजाट की राजनीति करते नजर आते हैं.

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जाटों के बाद यहां सबसे अधिक संख्या पंजाबी और वैश्य समाज की है. यहां पर करीब 1.70 लाख वोटर हैं जिसमें से 55 हजार जाट बताए जाते हैं. ऐसे में भाजपा को छोड़कर अन्य तीन प्रमुख पार्टियों ने जाटों पर ही दांव लगाना उचित समझा.

हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार नवीन धमीजा का कहना है कि यह उप चुनाव कई मायनों में दिलचस्प है. पहला यह कि यहां पर कांग्रेस के रणनीतिकार माने जाने वाले रणदीप सुरजेवाला की किस्मत दांव पर लगी है. तीन जाट प्रत्याशियों की वजह से सुरजेवाला की राह आसान नहीं दिख रही. मुझे यह नहीं समझ  आ रहा कि जब सुरजेवाला कैथल से विधायक थे तो उनकी जगह जींद से किसी और नेता को क्यों नहीं प्रत्याशी बनाया गया? जबकि विधानसभा चुनाव के सात आठ माह ही बचे हुए हैं.

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कांग्रेस, जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) और इनेलो ने जाट प्रत्याशी उतार कर अपनी लाइन क्लीयर कर दी है लेकिन बीजेपी ने अपनी छवि के अनुसार गैर जाट प्रत्याशी पर ही भरोसा जताया है. सत्तारूढ़ पार्टी यहां पर कोई रिस्क नहीं लेना चाहती क्योंकि इस चुनाव के कुछ ही दिन बाद लोकसभा चुनाव है. ऐसे में अगर जाटों की नाराजगी दूर नहीं की गई तो पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी होगी.

बीजेपी प्रवक्ता राजीव जेटली का कहना है कि हमारी पार्टी जाति में विश्वास नहीं करती. सबको साथ लेकर चलती है. इस बार हम यह चुनाव जीतकर मिथक तोड़ देंगे.

भितरघात का खतरा!

भितरघात का खतरा यहां सबसे ज्यादा कांग्रेस और भाजपा को है. बीजेपी ने यहां पर इनेलो में रहे व्यक्ति को पार्टी में शामिल करवाकर टिकट दिया है. इसलिए उसके पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी है. जबकि कांग्रेस ने अपने रणनीतिकार रणदीप सुरजेवाला को उतार दिया है. अंदरखाने प्रदेश के कई बड़े कांग्रेसी नेता उनकी जीत नहीं देखना चाहते क्योंकि अगर वे जीत जाते हैं तो कांग्रेस में सीएम पद का एक और बड़ा दावेदार खड़ा हो जाएगा.

 

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